जीवन – एक दही

Volume I  

Policy Paralysis: Unlimited Liability

#ViewsArePersonal #NothingOfficialAboutIt

 

देश में जब कोई बालक/बालिका IAS की परीक्षा में बैठता है तो मन में देश के लिए कुछ करने गुज़रने का एक सपना लेकर बैठता है| सोचता है कि देश के विकास के लिए कुछ करेगा, देश के भविष्य के निर्धारण में अपना एक योगदान देगा| इस नौकरी में पैसा तो नहीं है, मगर इज्ज़त रहेगी| एक इज्ज़त भरी नौकरी और देश के लिए महत्वपूर्ण विषयों पर फ़ैसले लेने का, नीति निर्धारण का मौका – यही सोच कर वह यहाँ आता है|

भगवान की दया से गलती से यदि उसका चयन हो जाता है तो बस – जीवन सफल हो गया लगता है| अब बस देश के विकास को कोई रोक नहीं सकता, देश में जो अब तक नहीं हुआ वो अब हो जाएगा| एक हनीमून पीरियड चालु हो जाता है जो अमूमन एक से दो वर्ष का रहता है| और फिर — CRASHHHHH…. वह मासूम बालक अर्श से फर्श पर आ जाता है, जीवन एक दही हो जाता है|

बालक को पता चलता है कि जहाँ वो सोच कर आया था कि बड़े-बड़े काम करेगा, वहां तो वो छोटे-छोटे फैसले भी बिना दस बार सोचे नहीं ले सकता है| बालक को सिखाया गया था कि, “बेटा, ईमानदारी से जनहित में फ़ैसले लोगे तो चिंता मत करना तुम्हारा कुछ नहीं होगा”| लेकिन यहाँ तो माजरा ही कुछ और है| बचपन से उसने पढ़ा था कि “innocent until proven guilty” अर्थात आपको दोषी सिद्ध करने का ज़िम्मा आरोप लगाने वाले पर है और जब तक आप दोषी सिद्ध नहीं हो जाते तब तक आपको कोई सजा नहीं हो सकती| किन्तु सरकारी व्यक्ति के लिए इसका उल्टा होता है – सारी दुनिया उसको दोषी मानकर चलती है जब तक कि वो खुद को निर्दोष साबित नहीं कर देता है| अब इस नौकरी में है तो बालक फैसले लेगा ही| फैसले लेगा तो किसी का बुरा होगा ही| जिसका बुरा होगा उसको बस बालक के ऊपर आरोप लगाना है, कोई प्रमाण नहीं देना है – एक ही चिट्ठी की कॉपियाँ प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर विभिन्न आयोगों और जांच एजेंसियों को देनी है| और फिर शुरू होगा जांचचक्र – जांचचक्र अभिमन्यु के चक्रव्यूह की तरह है जहाँ से मृत्युपरांत ही निकला जा सकता है| बालक के आने वाले साल देश के लिए बड़ा काम करने में नहीं बल्कि विभिन्न आयोगों की पेशियों में कठगरे में मुलजिमों की तरह खड़े होने में तथा एजेंसियों व जांच अधिकारियों को जवाब देने में ही निकल जायेंगे| सर पर तलवार हमेशा लटकी रहेगी कि कौन कब क्या कर बैठे| विभागीय कार्यवाही चलती रहेगी तो प्रमोशन नहीं होगा, विभागीय कार्यवाही बंद होगी तो कहीं जांच एजेंसी FIR न दर्ज कर ले| लेकिन भाई सबूत कहाँ हैं – बालक ने तो जनहित में फ़ैसला लिया था, कोई पैसा थोड़े खाया था? अरे भाई, जांच सबूत ढूँढने के लिए ही तो होती है, जांच चलाने के लिए कोई सबूत थोड़े चाहिए| बालक बरी होगा – चाचा सही कहते थे कि इमानदारी से फैसले लो कुछ नहीं होगा – लेकिन 10 साल जूते घिसने के बाद| तो फिर सबूत नहीं मिलने के बाद भी जांच 10 साल क्यूँ चल रही है? क्योंकि सबूत नहीं मिलने पर जांच बंद करना (या फिर सबूत मिलने पर दोषी करार देना) भी तो एक फ़ैसला है जो कि उस फैसला देने वाले को जांच के कठगरे में खड़ा कर जांच का लूप रीस्टार्ट कर देगा| इसीलिए हर कोई इस फ़ैसले को टालता रहता है जब तक 5-10 साल में कोई क्रांतिवीर आकर कोई फैसला नहीं लेता|

लेकिन फिर भी बालक ने पैसा तो खाया नहीं था न ही कोई अन्य लाभ लिया था| तो फिर तो उसको कुछ नहीं होना चाहिए? नहीं श्रीमान! शायद देश में करप्शन की सरकारी परिभाषा आपको पता नहीं है| आम आदमी के लिए करप्शन का अर्थ होता है किसी से अनुचित लाभ लेकर किसी को अनुचित लाभ देना| आप सोचोगे कि करप्शन केस में जेल में डालने के लिए रिश्वत लेना या आय से अधिक संपत्ति होना आदि सिद्ध करना पड़ेगा| नहीं बॉस, इस तरह की सारी ‘formalities’ आज से 15-20 साल पहले ही ख़तम कर दी गयी थी| करप्शन की कानून में परिभाषा है किसी प्राइवेट आदमी को यदि कोई लाभ पहुँचाया ‘बिना जनहित के’ तो वो करप्शन है| कोई रिश्वत आदि prove करने की आवश्यकता नहीं है| बात भी सही लगती है – अपना देश तो है जुगाड़ वाला देश – करप्शन का पैसा कहाँ कैसे ठिकाने लगता है जांच एजेंसी कहाँ तक ढूंढ पाती – तो बिना जनहित के यदि किसी प्राइवेट आदमी को फायदा पहुंचा है तो करप्शन ही होगा| जांच करने वाले को और कुछ सिद्ध करने की ज़रुरत नहीं है बस यह कि किसी प्राइवेट आदमी को लाभ पहुंचा है और कोई प्रोसीजर violate हुआ है| अब बालक का सर चकरा जाता है| आज की तारीख में कौनसा फ़ैसला वो ऐसा लेता है जिसमें किसी प्राइवेट पार्टी को लाभ न पहुँचता हो? वो ऑफिस के लिए एक कुर्सी भी खरीदता है तो कुर्सी बेचने वाले को फायदा पहुंचा रहा है| वो किसी का जाति प्रमाण पत्र भी जारी कर रहा है तो उस आदमी को फायदा पहुंचा रहा है| वो किसी भूमि का प्रयोग खेती से अन्य गतिविधियों में करने की परमिशन दे रहा है तब भी उस आदमी का फायदा पहुंचा रहा है| वो किसी पटाखे वाले को लाइसेंस दे रहा है तब भी तो उसका भला ही कर रहा है ना भाई? सरकार बनी ही लोगों के भले के लिए है|

तो फिर बात बहुत आसान है, जो भी काम करे नियमों की पूर्ण पालना करते हुए करे – कोई प्रोसीजर violate न करे| सिंपल| हीहीही| नॉट सो सिंपल माय फ्रेंड| बिकॉज़ गवर्नमेंट रूल्स अरे नेवर सो सिंपल :-D| एक तो सभी परिस्थितियों के लिए नियम बने नहीं होते| जहाँ पर बने होते हैं, वे बहुत काम्प्लेक्स होते हैं और उनका अलग अलग व्यक्तियों के द्वारा अलग अलग मतलब निकाला जा सकता है| सबसे बड़ी बात, आप कुछ पचास नियम लगा कर कोई काम कर रहे हैं, भगवान् जाने आज से 5 साल बाद कौन कहाँ से सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट का कोई बीस वर्ष पुराना आर्डर या किसी विभाग द्वारा 25 वर्ष पूर्व जारी कोई परिपत्र, दिशा निर्देश या आदेश लेकर आ जाए जिसकी जानकारी के अभाव में आपने वो फ़ैसला लिया था| बस… इनमें से कुछ भी हो तो हो गया प्रोसीजर violate और आपकी घिसाई शुरू| उदाहरण के लिए मान लीजिये आपको किसी पटाखे वाले को लाइसेंस देना है| आप पहले तो मालूम कीजिये कौनसे नियम लगेंगे – डरते डरते आपने निकाला Explosives Rules 2008| अब उसके सेकड़ों कठिन-कठिन पन्ने पढ़ कर समझिये आपके केस में क्या लगेगा| (ध्यान दीजिये, आपने जो समझा वो आपकी समझ है, हो सकता है 5 साल बाद जांच कर रहे व्यक्ति की और 15 साल बाद फैसला सुना रहे व्यक्ति की समझ आपसे भिन्न हो और उस परिस्थिति में आपकी समझ का कोई महत्व नहीं रह जाता|) फिर मान लीजिये ये सब जंग जीत कर आपने लग रही 19 शर्तों की चेकलिस्ट बनाई तथा उनकी पालना करने वालों को 3 वर्षों का लाइसेंस दे दिया| अब आपका 1 साल बाद वहां से ट्रान्सफर भी हो गया| आप नया जिला संभाल रहे हैं| एक दिन अखबार में पढ़ते हैं कि उस जगह पर किसी पटाखे की दूकान में आग लग गयी! भले ही आग किसी बीड़ी पीने वाले के अपनी बीड़ी यूँ ही फ़ेंक देने से लगी हो, लेकिन जांच में आपकी गर्दन ज़रूर अटकेगी| हो सकता है कि आपने जो 19 शर्तें निकाली थी उनके अलावा कभी किसी कोर्ट निर्णय या सरकारी आदेश से एक बीसवी शर्त भी लग रही हो जो आपकी रिपोर्ट में नहीं थी! बस गए आप, आजकल एक्टिविज्म का ज़माना है, धारा 302 का न सही लेकिन किसी न किसी और धारा में मुकदमा ज़रूर दर्ज होगा आपके विरुद्ध| हीहीही|

सभी कानूनों में दो प्रावधान हमेशा होते हैं – सदभाव या जनहित में किया कोई कार्य punishable नहीं होगा और किसी सरकारी व्यक्ति के विरुद्ध कोई न्यायिक कार्यवाही से पहले सरकार से परमिशन लेनी होगी| सदभाव या जनहित सिद्ध करने में हमारे बालक के बाल सफ़ेद हो जायेंगे और न्यायिक कार्यवाही की स्टेज से पहले हमारा बालक जेल की हवा भी आराम से देख आएगा| ये सिचुएशन कुछ इस तरह की है कि बालक सोचे उसने मारा था छक्का, लेकिन 5 साल बाद आकर कोई बोले कि ना जी ना, ‘बॉल डायरेक्ट मैदान से बाहर मारना आउट था’ :-P |

अच्छा यहाँ पर यह भी बता दें कि यहाँ हम एक आदर्श दुनिया में कल्पनात्मक रूप से कह रहे हैं कि हमारा बालक आराम से पूर्ण निष्ठा के साथ 19 दिशा निर्देश लगा कर जांच कर पायेगा| 19 नियम लगाने के बाद 100 में से 95 दुकानदारों को पटाखे का लाइसेंस मिलेगा ही नहीं| हाहाहा| हमारे बालक का विरोध होगा तथा राजनैतिक और अपनी बिरादरी में ही उसको ‘इम्प्रेक्टिकल एंड नॉट फिट फॉर फील्ड जॉब’ मान लिया जाएगा तथा उसकी अगली पोस्टिंगें इस निष्कर्ष के आधार पर ही होंगी मगर इन विषयों पर विस्तृत चर्चा आने वाले volumes में होगी|

इस प्रकार हम देखते हैं कि बालक के मरने के लिए उसके किसी दुर्भावनापूर्ण फ़ैसले लेने की ज़रुरत नहीं है, वो किसी भी फ़ैसले से मर सकता है जिसकी भविष्य में जांच हो जाए| जांच होने की प्रोबेबिलिटी देखें तो हो सकता हैं जांच इसलिए हो जाए की नयी पार्टी की सरकार आ गयी, या फिर किसी एक पॉलिटिशियन को दूसरे पॉलिटिशियन से बदला निकालना था, हमारा बालक क्रॉस-फायर में आ गया| हमारे बालक की ख़राब किस्मत, क्या किया जा सकता है| लेकिन सभी फैक्टर्स बालक के हाथ के बाहर नहीं होते| बालक अपने कर्मों से भी अपनी किस्मत फोड़ सकता है| एक तो तय है वो जितने ज्यादा फ़ैसले लेगा उतना ज़्यादा मरने की प्रोबेबिलिटी रहेगी| दूसरा वो जितने ज़्यादा लोगों को नाराज़ करेगा उतनी ज़्यादा ही भविष्य में उसकी मरने की प्रोबेबिलिटी रहेगी| उदाहरनार्थ वो जितने ज़्यादा अतिक्रमण हटाएगा, जितनी ज़्यादा अवैध शराब पकड़ेगा, जितना ज्यादा अवैध खनन रोकेगा, जितने ज्यादा ओवरलोडेड ट्रक पकड़ेगा आदि आदि उतना ज़्यादा लोगों को नाराज़ करेगा और अपनी किस्मत फोड़ेगा|

इसी सब पशोपेश में बालक था कि अचानक से निर्णय आया कि एक और ‘formality’ हट गयी है| पहले तो खुद के गलत फ़ैसले पर मुसीबत होती थी, अब तो नीचे वालों के गलत निर्णय पर भी होने लग गयी| मान लीजिये बालक को एक कमिटी का चेयरमैन बना दिया जिसको निर्णय करना है कि नगरीय क्षेत्र में अतिक्रमियों को मुफ़्त में उनके कब्ज़े की ज़मीन का पट्टा देना है कि नहीं| अब ये काम तो सम्बंधित नगरपालिका के निचले अधिकारी / कर्मचारियों का है ना कि जो 100 फ़ाइल कमिटी में निर्णय के लिए आई हैं, उनके फैक्ट्स वेरीफाई करना? कि मान लो एक शर्त है कि अतिक्रमी का कब्ज़ा 5 साल पुराना होना चाहिए, उसके आगे 30 फ़ीट की रोड होनी चाहिए, उसके कब्ज़े पर पक्का निर्माण होना चाहिए, उसका और कोई मकान नहीं होना चाहिए इत्यादि इत्यादि| इसके लिए नगरपालिका में एक इंजिनियर होगा जिसका काम होगा सड़क की चौड़ाई को मापना तथा अतिक्रमी का पक्का निर्माण कितना है ये बताना, एक अन्य डेडिकेटेड आदमी होगा जिसका काम होगा ये बताना कि इसका कब्ज़ा कितना पुराना है, एक अन्य का काम होगा बताना कि इसका और कोई मकान है या नहीं| बालक तो इन्ही की रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लेगा न कि ये अतिक्रमी इन सारी शर्तों की पालना करता है या नहीं? तभी तो बालक 100 फ़ाइल पर निर्णय ले पायेगा| यदि इनमें से किसी ने कोई तथ्य छिपाया है या फिर गलत पेश किया है तो इसमें बालक की क्या गलती? सरकार इनको भी तो पूरी सैलरी देती है ना भाई इनका काम करने के लिए? लेकिन यदि 10 साल बाद जांच एजेंसी या कोर्ट आपको बोले कि नहीं, इनके गलत काम की सज़ा बालक को मिलेगी तो? क्या बालक अब इनकी रिपोर्टिंग पर यकीन करेगा? क्या अब वो खुद सभी 100 फ़ाइल के मौके देख कर सभी फैक्ट्स वेरीफाई नहीं करेगा? लेकिन ये काम तो 10 लोगों को करना था, बालक के भी तो वही 2 हाथ, 2 पैर हैं| तो फिर 100 फ़ाइल कैसे निर्णित होंगी? बाई-द-वे बालक ऐसी 70 कमिटियों का चेयरमैन है| बाकी 69 कमिटियों के काम का क्या होगा? हमारे ऊपर वाले उदाहरण में बात करें तो माने की 5 साल बाद कोई आकर बालक को कहेगा कि ना जी ना आपने तो छक्का नहीं मारा मगर किसी और बैट्समैन ने मारा था इसीलिए आपको जीरो पर आउट माना जाएगा| बालक के क्षेत्र में 5 लाख लोग रहते हैं, बालक इनमें से आधों के जाति प्रमाण पत्र बनाता है, बालक 6 महीने में इनमें से कितनो की जाति व्यक्तिगत रूप से जान सकता है या फिर यह कि कौन क्रीमी लेयर में आता है कौन नहीं? वो तो गाँव में जो सरकारी कर्मचारी हैं, उन्ही की रिपोर्ट मानेगा ना? तो ऐसे में यदि किसी को गलत जाति प्रमाण पत्र जारी हो जाता है तो बालक के विरुद्ध मुक़दमा क्यूँ? हाँ, बालक की ज़िम्मेदारी तब बनती है जब बिना गाँव के सरकारी कर्मचारी की रिपोर्ट के या उसकी प्रतिकूल रिपोर्ट के बाद भी वह खुद प्रमाण पत्र जारी कर दे, लेकिन यदि रिपोर्ट अनुकूल है तो कैसे?

यदि कोई भी निर्णय लेने पर भविष्य में असीमित जवाबदेही हो तो कैसे कोई निर्णय होगा? किसी को रिश्वत लेते हुए या उसके या उसके परिवार वालों के पास आय से अधिक संपत्ति हो तो उनको पकड़ना जायज़ है| लेकिन सिर्फ निर्णय लेने के लिए पकड़ने लग गए तो कैसे होंगे निर्णय? सोचिये अभी ही कोर्ट में किसी केस का निर्णय होने में सालों-दशक लग जाते हैं जबकि जजों को उनके निर्णय की वजह से नहीं पकड़ सकते| इतने सारे निर्णय निचले कोर्ट से ऊपर के कोर्ट में जाकर पलट दिए जाते हैं – सबूत वही होते हैं, कानून वही होता है| ऐसे में यदि निचले कोर्ट के जज को अपील के केस में ऊपर के कोर्ट में पेशियों पर जाना पड़ जाए या फिर ऊपर से उलट फैसला होने पर जेल जाना पड़ जाए तो सालों में होने वाले निर्णय दशकों में और दशकों में होने वाले निर्णय सदियों में नहीं होने लग जायेंगे? और यदि ऐसा कानून बन जाए कि आरोपी के कोर्ट द्वारा बरी होने की स्थिति में ना केवल जांच अधिकारी बल्कि पुलिस SP के ऊपर भी मुकदमा होगा तो कितने लोगों को पकड़ने लगेगी पुलिस? क्या होगा देश का ऐसी स्थिति में? दुखद बात यह है कि ऐसा कुछ हाल वर्तमान में सरकार में हो चुका है|

इतना सब कुछ होने के बाद खबर आती है कि एक नया अभियान आने वाला है| अबके 100 नहीं 500 फाइल आएँगी… 10 नहीं 2 दिन में करना होगा सब कुछ… खत्म हो गया पालिसी पैरालिसिस…

 

नोट: इस आर्टिकल को लिखने के निर्णय का परिणाम क्या होगा मुझे नहीं पता| मेरी समझ से मैंने कोई नियम नहीं तोड़ा है बाकि देखिये|

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77 thoughts on “जीवन – एक दही”

  1. This is so beautifully written! But I want to ask you -does it deter you in your decisions? Do you regret your choice three years down the line? Or does it make you stronger? Personal opinions solicited amidst all those 500 files in 2 days of course!! hihihi

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  2. It was really touching sir ..i am following u from the beginning and i am damn inspired by u..The same feeling was reflected when u gave speech and was talking about the cricket team ..BT irrespective of the situation millions of people have only faith in bureaucrat like u ..

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  3. Sir, you are walking on a path which has dual footpaths. One with sharp thorns and rough pebbles and the other with soft cotton sheets .The former rips you apart every day but offers you a happy meal and the latter makes your voyage your house comfortable but brings Storms of guilt and greed you chose the former one it takes courage to choose the former one and you indeed a courageous . I firmly believe that through your dedication you will be able to merge the two footpaths into one. A footpath way the future aspirants can walk confidently. A footpath where the future aspirants can make their own decisions which will help the nation progress more .A footpath where the future aspirants can stand and say yes “it is all worth it.”

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  4. **PLEASE IGNORE MY ABOVE COMMENT, TYPING ERRORS**
    Sir, you are walking on a path which has dual footpaths. One with sharp thorns and rough pebbles and the other with soft cotton sheets .The former rips you apart every day but offers you a happy meal and the latter makes your voyage comfortable but brings Storms of guilt and greed .You chose the former one it takes courage to choose the former one and you indeed a courageous . I firmly believe that through your dedication you will be able to merge the two footpaths into one. A footpath which symbolises truth and sincerity. A footpath where the future aspirants can walk confidently. A footpath where the future aspirants can make their own decisions which will help the nation progress more .A footpath where the future aspirants can stand and say yes “it is all worth it.”

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  5. respected sir..many IAS aspirants are inspired by you(myself included). your article above tells about hurdles bureaucrats face while making even minute decisions but as you keep telling us its worth it… can you tell us in detail about positive side of being working in system so it can make our vision more clear.

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  6. गौरव सर,आप हमारे आदर्श हैं।आपको ही देखकर हमें भी देश के लिए कुछ कर गुजरने का सर्वोत्तम रास्ता IAS बनना चुना है।हम इस तरह आपको कमजोर होता हुआ नहीं देख सकते और ना ही ऐसी विकट स्थितियां होंगी ये जानकर भी अब अपना रास्ता नहीं बदल सकते।जब काम बड़ा है तो चुनौतियां भी बड़ी ही होंगी।जल्द आ रहा हूं मैं भी इसका सामना करने के लिए।

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  7. सर हमारे विभाग में इस कृत्य (चमचो) से बचने के लिए राजस्थानी भाइयों ने एक विधि का नाम दिया है चूषण विधि

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  8. सही कहा आपने, सरकारी नौकरी में हुए तो क्या हुआ, हम देश के चिंतनशील नागरिक भी हैं और भावशील मुनष्य भी, अत: अभिव्यक्ति अधिकार भी है और आवश्यकता भी ! आपके शब्द कई लोगों के मन की बात हैं, कहते रहिये!

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