जीवन एक दही Volume II: The Heisenberg’s Principle

There is a trade-off between punishing the corrupt and protecting the innocents. As much as corruption harms public interest, so does the witch-hunting of bonafide decision making. A good law must do the balancing act.

Please read the full article here.

 

Reproduced below for easy reference…

पिछले वर्ष लेखक ने एक लेख लिखा था इसी शीर्षक से : जीवन – एक दही| उसमें एक ईमानदार और देश के लिए कुछ कर गुजरने की चाह रखने वाले एक बालक की व्यथा का वर्णन था जो सरकारी तंत्र की जटिलताओं की वजह से पालिसी पैरालिसिस के भंवर में फँस कर रह जाता है| लेख को लिखने के पीछे उद्देश्य था आम जन के सामने सिस्टम में व्याप्त उन मुद्दों को रखना  जिनकी वजह से ईमानदार अफसर भी सदभावी रूप से फैसले लेने में कठिनाई महसूस करते हैं| उद्देश्य था नागरिकों को पालिसी पैरालिसिस के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारणों तथा इससे उन्हें होने वाले नुक्सान से परिचित कराना ताकि इस बारे में भी कुछ किया जा सके, लोग सिर्फ इसको सरकारी तंत्र की एक और कमज़ोरी मानकर अंगीकार ना कर लें| लेख को जहाँ अधिकांश लोगों ने सराहा वहीँ कुछ लोगों ने व्यापक मुद्दों को देखने की बजाय इसको लेखक की व्यक्तिगत कमज़ोरी व निराशात्मक सोच करार देते हुए उन मुद्दों पर विवेचन से इनकार कर दिया|

सभी का आभार| उसके बाद से वॉल्यूम II भी लिखना चाहता था मगर कभी संयोग नहीं बैठा| आज मुझे ख़ुशी है कि कालांतर में लेख में उठाए हुए कुछ मुद्दे केवल मात्र लेखक की व्यक्तिगत कमज़ोरी या निराशात्मक सोच का परिणाम ही नहीं निकले बल्कि देश की जनता ने भी इनको वास्तविक मानते हुए संसद द्वारा भ्रष्टाचार निरोधी कानून में बदलाव किया| आज के इस लेख के द्वारा लेखक की पुनः बालक के माध्यम से पाठकों से अपील रहेगी कि महज कुछ आलोचनात्मक लेखों को पढ़ कर इन बदलावों को ख़ारिज करने की धारणा बनाने से पहले इनके औचित्य को समझने का प्रयास अवश्य करें|

भ्रष्टाचार कोई भी ज़िम्मेदार नागरिक नहीं चाहता| भ्रष्टाचार देश के लिए अभिशाप है तथा देश को विकसित होने की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में से है| भ्रष्टाचारी को सज़ा मिलनी चाहिए, यही लोकहित में है| किन्तु यह भी सत्य है कि यदि एक भ्रष्टाचारी को पकड़ने के लिए हम कानून को इतना सख्त करते जाएँ कि दस ईमानदार अफसर भी बिना मतलब के परेशान हो जाएँ तो इसका नुकसान भी देश को ही झेलना पड़ेगा क्यूंकि फिर वो अफ़सर निर्णय लेना ही छोड़ देंगे| यदि बैंकों ने किन्ही को कर्जा दिया और उनके ना चुकाने की स्थिति में आप बिना कुछ देखे सभी बैंक के अफसरों को जेल में डालने लग गए तो भ्रष्टाचार तो रुकेगा, परन्तु फिर कोई भी बैंक किसी भी व्यक्ति को कोई ऋण नहीं देगा और देश की अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठ जाएगा| भाई, घर परिवार तो सभी का होता है न? पांच – सात वर्ष बाद फैसला गलत साबित होने पर बिना भ्रष्टाचार किये भी यदि जेल जाने लगे तो कौन समझदार व्यक्ति फ़ैसले लेगा? पुराने क़ानून में दुर्भाग्यवश यही हो रहा था| जैसा कि लेखक ने पिछले लेख में बताया था कि उस कानून में लोकसेवक को जेल में डालने के लिए ये सिद्ध करने की आवश्यकता ही नहीं थी कि उसने पैसा खाया है या कुछ और अनुचित लाभ लिया है! सिर्फ जांच करने वाले या फैसला सुनाने वाले को यह सिद्ध करना था कि किसी को व्यक्तिगत लाभ दिया है तथा किसी नियम की पालना में चूक हुई है| अब भाई, सरकार तो लोगों को लाभ देने के लिए ही बनी है ना, नुकसान करने के लिए थोड़ी? सरकार का काम है लोगों के घर बनाना ना की तोड़ना| अब आप कहेंगे की लोगों को घर बनाने का पैसा या पट्टा दो मगर सारे नियमों की पालना करके| सिंपल, राईट? मगर भाईसाहब, सरकारी नियम कब से सिंपल होने लग गए? किसी एक लेखा विशेषज्ञ की फ़ाइल किसी दूसरे लेखाधिकारी को दिखाओ तो वो उसमें कोई कमी तो अवश्य निकाल लेगा| सालों साल अलग अलग केसों में बड़े बड़े लोग इन्ही नियमों की तो अलग अलग व्याख्या करते रहते हैं और अलग अलग फैसले सुनाते रहते हैं| आपकी किस्मत आपके केस में फैसला लेने वाले क्या व्याख्या कर जाएँ! और फ़िर किसको पता है कि आपने बीस नियम व परिपत्र देख कर कोई फैसला लिया तो बाद में पच्चीस साल पुराना कोई प्रतिकूल नियम या कोर्ट का फैसला सामने न आ जाए| माने कि मर्डर केस में मैंने मर्डर किया यह सिद्ध करने की आवश्यकता ही नहीं, सिर्फ कि घर में नानी के ज़माने का एक चाक़ू है जिस पर सॉस लगी हुई है काफी है| साथ ही ज़रूरी भी नहीं आप ही की गलती हो| आपका काम फाइल पर उपलब्ध तथ्यों के आधार पर फैसला लेना है, अब आपके नीचे वाले ने फाइल पर तथ्य ही गलत पेश किये हैं तो भी केस में आप ही लपेटे में आओगे क्यूंकि लॉजिक सिंपल है – फाइल पर आपके साइन हैं! इतना होते हुए भी मान लो आप 90 प्रतिशत केसों में बरी हो जाओगे, परन्तु बरी होने से पहले आपके पंद्रह साल तो लग ही जाएंगे और इज्ज़त जीवन भर के लिए फलूदा हो जायेगी सो अलग|

नए कानून में इस विसंगति को दूर किया गया है| जिस प्रकार हत्या के केस में यह सिद्ध करने की आवश्यकता रहेगी कि आपने वाकई में हत्या की है, उसी प्रकार अब भ्रष्टाचार के केस में यह सिद्ध करना आवश्यक होगा कि आपने वाकई में पैसे खाए हैं या कोई अनुचित लाभ लिया है| फेयर, राईट? जिसने खाए हैं वो पकड़ा जाएगा मगर जिसने नहीं खाए, वो बेचारा परेशान नहीं होगा|

इसी प्रकार एक और महत्वपूर्ण पक्ष है अभियोजन स्वीकृति लेने का| आलोचक कहते हैं कि यह भ्रष्टों को बचाने का एक अनुचित तरीका है| जब आम आदमी को यह सुरक्षा कवच नहीं तो भ्रष्ट सरकारी लोगों को क्यूँ? भाई, यदि आप मानते हैं कि सभी सरकारी लोग भ्रष्ट हैं, तब तो ठीक है, सभी को सूली पर चढ़ा दीजिये, भ्रष्टाचार अपने आप मिट जाएगा| और यदि आपकी रक्त पिपासा थोड़ी शांत हुई हो या आपका ऐसा नहीं मानना हो, तो फिर से ऊपर लिखी बात याद कीजिये – जितना लोकहित भ्रष्ट को पकड़ने में है, उतना ही लोकहित ईमानदार को बिना मतलब के परेशान ना करने में भी है| सरकारी सेवक का काम लोकहित की रक्षा करना होता है| दुर्भाग्यवश, चंद बड़े प्रकरणों को छोड़ कर जन सामान्य को या तो पता ही नहीं होता कि उनके हितों पर कैसे कुठाराघात हो रहा है या फिर वो इतनी सशक्त स्थिति में नहीं होते कि अपने हितों की रक्षा कर सकें| यह दुर्भाग्यपूर्ण  सच्चाई है कि कभी कभी ऐसी परिस्थितियाँ बन जाती हैं कि निहित स्वार्थवश कुछ लोगों द्वारा लोकहित का हनन किया जा रहा होता है| ऐसे में यदि अपना बालक लोकहित की रक्षा करने के लिए इन लोगों का विरोध करता है तो क्या ये लोग बालक को अनर्गल तरीकों से झूठी सच्ची शिकायतें करके परेशान करने की कोशिश नहीं करेंगे? क्या उसके ऊपर अंट-शंट आरोप नहीं लगायेंगे? क्या यदि वह किसी बालिका छात्रावास में छात्रावास संचालक द्वारा स्थानीय नेताओं की शरण में की जा रही हेरा फेरी को रोकता है तो वो स्वयं या बालिकाओं के ज़रिये उसके ऊपर लज्जाभंग का आरोप नहीं लगा सकती? POCSO में तो श्रीमान मुकदमा दर्ज होने के साथ ही गिरफ़्तारी का प्रावधान है, ऐसे में वह क्यूँ छात्रावास में चल रहे गबन को रोकने का प्रयास करेगा? यदि बालक निचले दामों में छूट रही बोली को रोकता है तो क्या स्थानीय शक्तिशाली लोग उसपर जातिसूचक टिप्पणियाँ करने का आरोप नहीं लगा सकते? ऐसे में क्या उच्चतम न्यायलय द्वारा इन प्रकरणों में मुकदमा दर्ज होते ही स्वतः गिरफ़्तारी के प्रावधान की जगह जांच के उपरांत ही गिरफ़्तारी का प्रावधान करना फेयर नहीं है? आपको क्या लगता है कि यदि बालक स्थानीय शक्तिशाली लोगों के द्वारा सरकारी धन का मनमाना दुरूपयोग रोकेगा, तो वो बालक को येन केन प्रकरण में फंसाने का प्रयास नहीं करेंगे? ऐसे में बालक क्या करे? यदि उसको कोई सुरक्षात्मक कवच नहीं होगा तो क्या वो लोकहित के लिए प्रयास करना छोड़ नहीं देगा? अनर्गल आरोप उसी पर लगते हैं जो किसी का बुरा करता है और लोकहित की रक्षा के लिए यह अनेक बार आवश्यक होता है कि बालक किसी का बुरा करे| ऐसे में क्या बालक को अभियोजन स्वीकृति और स्पष्ट कानून की आवश्यकता नहीं है? यदि आपको लगता है नहीं, तो कृपया उससे लोकहित यानी कि आपके हित की रक्षा करने की आस भी ना रखें| और हाँ, अभियोजन स्वीकृति मना करना इतना आसान भी नहीं होता| फाइल बोलती है जनाब| और ऐसा नहीं कि एक आदमी ने स्वीकृति देने से इनकार कर दिया तो बस हो गयी मना| स्वीकृति नहीं देने का फैसला तीन स्तरों से अनुमोदित होने के उपरान्त ही संभव हो पाता है| सिस्टम को जिसको बचाना है उसको वो बचा ही लेगा, उसके लिए अभियोजन स्वीकृति की मना करने की आवश्यकता नहीं है, अनुसंधान से लेकर अंतिम निर्णय तक कहीं भी वो बच सकता है| सामान्य प्रकरणों में साक्ष्यों की मौजूदगी में अभियोजन स्वीकृति को मना कर पाना मुश्किल ही होगा, किन्तु इस से इमानदार बालक को बहुत संबल मिलेगा जिसके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं हैं| साथ ही पहले पता नहीं क्यूँ, अभियोजन स्वीकृति का संरक्षण ट्रान्सफर या रिटायरमेंट के बाद उपलब्ध नहीं था| माने की 6 महीने बाद आपके ट्रान्सफर के या रिटायरमेंट के उपरांत शिकायत दर्ज हो और आप रणक्षेत्र में अकेले| ऐसे में पुनः लोकहित का संरक्षण कोई कैसे करेगा? हाल के संशोधन में इस विसंगति को भी दूर किया गया है|

आशा है इतना पढ़ने के बाद आप आलोचकों के शब्दाडंबर में ना बहकर दूसरे पक्ष को भी समझेंगे| जीवन की तरह लोकहित भी एक संतुलन बनाने की क्रिया है| दोनों चरम हानिकारक हैं| धन्यवाद्|

#ViewsArePersonal #NothingOfficialAboutIt

4 Replies to “जीवन एक दही Volume II: The Heisenberg’s Principle”

  1. I completely agree with writer’s view. My father has been suffering from such a case of wrong distribution of pension of Rs. 1500 only , in the capacity of a sarpanch, from past 7 years.
    Mental trauma, and soul tiring judiciary process aside, this case has made him so weak that he no longer volunteers for any welfare of people where government is involved.

    In practical life, its not possible for an honest person to know all the nuances of law. Executing a law on paper is easy but on field some errors are bound to occur.

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